Jaun Eliya Ghazal

ख़ामोशी कह रही है कान में क्या
आ रहा है मेरे गुमान में क्या

अब मुझे कोई टोकता भी नहीं
यही होता है खानदान में क्या

बोलते क्यूँ नहीं मेरे हक़ में
आबले* पड़ गए ज़ुबान में क्या

मेरी हर बात बेअसर ही रही
नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या

वो मिले तो ये पूछना है मुझे
अभी हूँ मैं तेरी अमान में क्या

शाम ही से दुकान ऐ दीद है बंद
नहीं नुकसान तक दुकान में क्या

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या

ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या

Jaun Eliya

Jaun Eliya

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